SWASTIDHAM JAHAZPUR स्वस्तिधाम जहाजपुर
स्वस्तिधाम मन्दिर जहाजपुर
भीलवाड़ा जिले के प्रमुख तीर्थ स्थानों में एक नाम और जुड़ गया है "स्वस्तिधाम जहाजपुर" जो कि जहाज़ के आकार का जैन अतिशय तीर्थ क्षेत्र है। जहाजपुर के बारे में किवंदतियों में कहा जाता है कि पूर्व में यहाँ स्वर्ग के राजा इंद्र का जहाज़ उतरता था, शायद इसी भावना को रखते हुए इस मंदिर का निर्माण जहाज के आकार में किया गया हो।
वैसे जहाजपुर का पूर्व नाम यज्ञपुर था जिसका अपभ्रंश होते "जाजपुर" ओर जहाजपुर हुआ।
स्वस्तिधाम भीलवाड़ा जिला मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर है, जबकि जहाजपुर कस्बे से यह तीर्थ क्षेत्र लगभग 2 किलोमीटर है। ऐसा माना जाता है कि जहाजपुर क्षेत्र पूर्व में जैन धर्म से प्रभावित था तथा यहाँ काफी जैन धर्मावलंबली रहे होंगे जिसके पुष्टि यहाँ निकलती जिन मुर्तिया करती है।
मुनिसुव्रतनाथ जी भगवान की मूर्ति कब और कैसे प्रकट हुई?
जहाजपुर में एक मुश्लिम परिवार के घर मे खुदाई के दौरान जैन धर्म के 20 वें तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ जी की मूर्ति निकलीं जिसे कस्बेवासियों ने "बड़े बाबा" का नाम दिया, यह जिनमूर्ति बहुत ही चमत्कारी रही और जमीन से निकलने के बाद 3 अलग अलग रंगों में दिखाई दी।
एक बार "बड़े बाबा" के स्वांस लेने की खबरे भी आई जिसकी पुष्टि प्रत्यक्षदर्शियों ने की।
2013 में जिस समय यह मूर्ती प्रकट हुई उस समय 105 स्वस्तिभूषण माताजी का चार्तुमास भी जहाजपुर के जैन मंदिर में चल रहा था, यह जैन मंदिर भी लगभग 1500 सालो से भी ज्यादा पुराना है।
2013 में यहाँ काफी जैन मुर्तिया खुदाई में निकली
मूर्ति चमत्कारी हैं इसकी जानकारी कब और कैसे हुई
एक बार मुनिसुव्रतनाथ जी के स्वांस लेने की खबरे भी आई जिसकी पुष्टि प्रत्यक्षदर्शियों ने की और जमीन से निकलने के बाद 3 अलग अलग रंगों में दिखाई दी
स्वस्तिधाम मन्दिर निर्माण और पंचकल्याण महोत्सव २०२०
स्वस्तिभूषण माताजी ने स्वामी मुनिसुव्रतनाथ भगवान का जिनालय बनाने का बीड़ा उठाया और 50 एकड़ जमीन में लगभग 6 वर्षो में यह जिनालय बन कर तैयार हुआ जिसे "स्वस्तिधाम" नाम दिया गया।
वर्ष 2020, जनवरी में पंचकल्याणक महोत्सव में "बड़े बाबा" को स्वस्तिधाम जिनालय में स्थापित किया गया, जिसमे काफी संख्या में धर्मावलंबियों ने हिस्सा लिया।
स्वस्तिधाम मन्दिर तक कैसे पहुँचा जाए
स्वस्तिधाम भीलवाड़ा जिला मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर है
जहाजपुर कस्बे से यह तीर्थ क्षेत्र लगभग 2 किलोमीटर है
नीचे दिए गए map को देखकर आप स्वस्तिधाम मन्दिर तक पहुँच सकते हैं
भूगर्भ से निकली इन मूर्तियों की पहचान कैसे होती होगी? यह मूर्ति मुनिसुव्रतनाथ की है यह कैसे पता चला?
इस प्रश्न का उत्तर है चाहे जैन मूर्तियां हो, चाहे हिन्दु धर्म की मूर्तियां सभी मूर्तियों की पहचान उनके प्रतीक चिन्ह, आसन, वाहन आदि से होती है, जैसे हाथ मे चक्र, मुकुट पर मयूर पंख यह भगवान श्री कृष्ण के प्रतीक चिन्ह है, हाथ में वीणा तो माँ सरस्वती, जैन मूर्तियों में यदि सिर पर नागों का छत्र है तो पार्श्वनाथ भगवान, अतैव मूर्ति कितनी भी प्राचीन हो है इन चिन्हों के आधार पर पहचान सकते है।
जैन मूर्तियों में मूर्तियां मुख्यतया तीन मुद्रा में मिलती है,
एक पद्मासन मुद्रा में ध्यान लगाते हुए
दूसरी खड़े हुए मुद्रा में
तीसरी एक ही पत्थर में पीठ से पीठ लगाए चार मूर्तियां चारो दिशाओ की देखते हुए होती है।
भारत में मिली हुई सबसे प्राचीन जैन मुर्तिया ईसवी सन (जन्म से पुर्व) से 8 शताब्दी पूर्व की है।
यह मूर्तियां मथुरा के कंकाली टीले से प्राप्त हुई है।
इन मुर्तिया की पहचान लक्षणों के चिन्हों के आधार पर की गई थी।
जैन मूर्तियों में ज्यादातर मूर्तियों में तीर्थंकर ध्यान मुद्रा में एक आसन पर बैठे होते है, जिनके नीचे आसन पर विभिन चित्र होते है, ओर जो चित्र केंद्र में होता है उसी आधार पर तीर्थंकर मूर्ति की पहचान होती है जैसे जहाज़पुर में निकली बड़े बाबा कि मूर्ति में आसन के केंद्र में कछुए की तस्वीर थी जो कि 20 वे तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ नाथ के प्रतीक चिन्ह है।


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