अपने अतीत को बयां करता जहाजपुर दुर्ग
जहाजपुर के दक्षिण की ओर पहाड़ी पर दुर्ग स्थित है। मध्य काल में दुर्ग की मरम्मत महाराणा कुम्भा ने करवाई थी । दुर्ग में एक-एक गहरी खाई वालेके दक्षिण की ओर पहाड़ी पर दुर्ग स्थित है। मध्य काल में दुर्ग की मरम्मत महाराणा कुम्भा ने करवाई थी । दुर्ग में एक-एक गहरी खाई वाले दो परकोटे एक के भीतर एक है। किले के भीतर आज भी कुछ मंदिर स्थापित है, जिनमें सर्वेश्वर नाथ जी का मंदिर सबसे प्राचीन माना जाता है। आज भी निजला एकादशी पर किले में स्थित मंदिर से रामरेवाडी सबसे पहले लाई - जाती है, उसी के बाद नगर के अन्य मंदिर से रामरेवड़ियां निकाली जाती है। गांव और दुर्ग के एकादशी पर किले में स्थित मंदिर से रामरेवाडी सबसे पहले लाई - जाती है, उसी के बाद नगर के अन्य मंदिर से रामरेवड़ियां निकाली जाती है। गांव और दुर्ग के
यहां कण-कण में है देवताओं का वास
जिला मुख्यालय से उत्तरी-पूर्वी सीमा के निकट सुरम्यी पहाड़ों के बीच बसा जहाजपुर कस्बे के बारे में माना जाता है कि यहां के कण-कण में देवताओं का वास है। यहां प्राचीन दुर्गों के खण्डहर आज भी मौजूद है। जहाजपुर के बारे में मान्यता है कि मौर्य सम्राट अशोक के पौत्र सम्प्रति ने इस कस्बे को बसाया था। सम्प्रति जैन धर्म के अनुयायी थे। इस कारण यहां जैन समाज के लोग बस गए। यहीं वजह है कि आज भी जहाजपुर कस्बे में खुदाई के दौरान जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां और जैन मंदिर के अवशेष निकलते रहते है।
बदले के लिए नागयज्ञ
जहाजपुर के नामकरण के बारे में बताया जाता है कि राजा परिक्षित ने ध्यानस्थ ऋषि के गले में मरा हुआ सर्प डाल दिया । ऋषि पुत्र श्रृंग को इसका पता चला तो राजा को श्राप दिया कि यहीं सर्प तुम्हें सात दिन बाद डसेगा, - जिससे तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी । यह सही साबित हुआ। राजा परिक्षित की मृत्यु के उनके पुत्र जन्मेजय ने बदला लेने के लिए - नाग यज्ञ करवाया जिसमें सभी प्रकार के नागों का हवन किया गया । तभी से इसका नाम यज्ञपुर हो गया । बाद में अपभ्रंश होते हुए इसका नाम यज्यपुर, जज्यपुर के बाद अब जहाजपुर हो गया है।
अशोक के पौत्र सम्प्रति ने बनवाया दुर्ग
भीलवाड़ा जिले की उत्तर-पूर्वी सीमा के निकट पहाड़ी पर जहाजपुर का दुर्ग दूर से दिखता है। दुर्ग काफी प्राचीन है। बिन सार संभाल के यह खंडहर में बदल रहा है। हालांकि महल का अस्तित्व बरकरार है। कहा जाता है कि मौर्य सम्राट अशोक के पौत्र सम्प्रति ने निर्माण कराया था। जहाजपुर के दक्षिण पूर्व में नागोला तालाब है जहां जन्मेजय ने नागयज्ञ कराया था। यहां नागदी बांध, बारहदेवरा एवं गैबीपीर की मस्जिद देखने लायक है।
गुप्त संकेत से पहुंचाते थे सूचनाएं
जहाजपुर का इतिहास पुरातत्व, प्राकृतिक सौंदर्य और आंचलिक संस्कृति का विशाल भण्डार है। ऊंचे और हरे भरे पर्वत घाटियां व लबालब भरे जलाशय नदी, नाले, देवालय, ऐतिहासिक भवन, धर्म, केन्द्र काष्ठकला तथा मीणा चित्र शैली इस क्षेत्र के आर्कषण में चार चांद लगा देती है। यहां माला जी महाराज की डूंगरी पर स्थित माला जी महाराज की पहाड़ी पर एक विशाल नगाड़ा है, जिसे बजाकर आसपास के गांवों में गुप्त सूचनाओं को पहुंचाया जाता था। विपत्ति आने पर लोगों को एकत्र किया जाता था।
शाहपुरा दरबार के अधीन रहा
जहाजपुर सन् 1567 के लगभग मुगल शासक अकबर के अधिकार में चला गया था। कुछ वर्षों बाद इसे राणा जगमाल को जागीर के रूप में दे दिया गया। अठारहवीं शताब्दी में जहाजपुर कुछ समय के लिए शाहपुरा के राजा के अधिकार में रहा। सन् 1806 में कोटा के जालिम सिंह झाला ने इस पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया, परन्तु ब्रिटिश सरकार के बीच बचाव करने पर सन् 1819 में यह महाराणा को लौटा दिया गया।
नागोला तालाब बन गया नागदी
जहाजपुर की दक्षिण दिशा में कुछ दूरी पर नागोला तालाब स्थित है, जो वर्तमान मेनागदी बांध के नाम से जाना जाता है। इसी तालाब के किनारे नाग यज्ञ किया गया। आज भी इसी स्थान पर नाग देवता की मूर्ति लगी हुई है। बारह देवरानागोला तालाब से एक छोटी सी नदी निकलती है, जिससे नागदी नदी के नाम से जाना जाता है। जहाजपुर कस्बे की बसावट इसी नदी के किनारे है। नदी के पूर्वी किनारे पर एक ही स्थान पर 12 मंदिर बने है। इसे बारह देवरा के नाम से जाना जाता है। देवरों के विषय में कहा जाता है कि राजा जन्मेजय ने सोमनाथ की प्रतिमा अपने हाथों से स्थापित की । सोमनाथ का देवालय प्राचीन है और तीर्थ स्थान के रूप माना जाता है। नागदी नदी के किनारे पर नृसिंह द्वार और गर्म व ठण्डे पानी के दो जलकुण्ड है।
20 हजार वर्ग फीट में फैला है जहाजनुमा दुमंजिला जैन मंदिर
वर्ष 2015 में जहाजनुमा मंदिर का मॉडल तैयार कर रखी गई थी मंदिर की नींव

जहाजपुर स्थित स्वस्तिधाम दुनियां में अनूठी जैन तीर्थ स्थल के रूप में विकसित हुआ है। यहां मुनि सुव्रतमाथ की प्रतिमा स्थापित है। जहाजनुमा स्वस्ति धाम में आचार्य ज्ञान सागर व स्वस्तिधाम की प्रणेता आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी के सानिध्य में पिछले 31 जनवरी से 7 फरवरी तक आयोजित आठ दिवसीय जनबिंब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव एवं विश्वशांति महायज्ञ हुआ तो देश ही नहीं दुनियां से बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं पहुंचे देश के त विभिन्न हिस्सों से पांच लाख से न अधिक श्रावक-श्राविकाओं ने पंचकल्याणक में आयोजित विभिन्न । कार्यक्रमों में सहभागिता निभाई।
अतिशय क्षेत्र जहाजपुर में 23 अप्रेल 2013 को महावीर जयंती पर भू गर्भ से निकली मुनिसुव्रतनाथ भगवान की बहुत ही सुंदर और चमत्कारिक प्रतिमा निकली थी। जैन साध्वी आर्यिका स्वस्ति भूषण माता की इच्छा थी कि इस मूर्ति को विराजमान करने के लिए जहाजपुर में पानी के जहाज जैसा भव्य और अद्भुत मंदिर बने। वर्ष 2015 में जहाजनुमा मंदिर का मॉडल तैयार कर मंदिर की नींव रखी गई। 20 हजार स्क्वायर फीट में नवनिर्मित जहाज के आकार में बने भव्य मंदिर की वेदी पर यह प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर दो मंजिला है।

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